Wednesday, 29 March 2017

दोहा

उसको अपने अहम का,ऐसा चढ़ा बुखार ।
अपने मुख से कह रहा, मेरे शिष्य हज़ार ।।

विजय मिश्र"दानिश"
29-03-2017

Saturday, 14 January 2017

मुक्तक

शुभ रात्री दोस्तों |आप सभी को चैन से सुकून की नींद आये ताकि एक नई सुबह एक खुशनुमा सुबह आप के जीवन को महका दे खुशियों से भर दे |आप सब खुश रहे ,मस्त रहे आनन्द में रहे |इस उम्मीद के साथ की हर रात की सुबह होती है और सूरज अपनी रौशनी से सब को प्रकाशमय कर देगा
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कुछ पंक्तिया आप सब की नज़र
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नज़र किसी गरीब की उठी नहीं झुकी रही ।
अमीर शेख के यहाँ गुलाम बन दुखी रही ।।
नसीब कब बदल सका हिसाब सब गलत हुआ ,
न हार का मलाल था न जीत की ख़ुशी रही ।।

विजय मिश्र दानिश

टूटा  घरौंधा  प्यार  का ,उलझे  हुए  जज्बात है |
कुछ भी नहीं बदला कभी बिगड़े सदा हालात है ||
कोशिश मगर करता रहा मैं प्यार का मन्दिर बने ,
बस चार दिन की ज़िन्दगी है फिर अँधेरी रात है ||

विजय मिश्र "दानिश"

पैगाम मुहब्बत का नाकाम हुआ यारो |
जो साथ रहा बरसों ,गुमनाम हुआ यारो ||
क्या जुर्म हुआ मुझसे ,क्यों मीत खफा मुझसे ,
हर चोट लगी दिल पर ,बदनाम हुआ यारो ||

विजय मिश्र "दानिश"


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मकर संक्रांति के उपलक्ष् में कुछ दोहे

कटती रही पतंग जब ,लूटन लागे यार ।
कैसे बचती जान फिर ,लपके कई हज़ार ।।

जब तक धागे साथ थे ,चली गगन के पार ।
धागों से कट कर गिरी , अटकी है मझधार ।।

धागों का बंधन लिये ,उड़ती रही पतंग ।
रब जाने किस चोर ने ,काट दिए थे तंग ।।

कटी डोर से जिस घड़ी ,हुई बहुत लाचार ।
मैंने सोचा बाँध लूँ  , दिल से दिल के तार ।।

इधर उधर उड़ती फिरूँ , रहना मुझ से दूर ।
आज़ादी मेरा चलन , करता क्यूँ मजबूर ।।

विजय मिश्र "दानिश"
14-01-2017