Thursday, 30 June 2016

ग़ज़ल

बिना कुछ कहे भी हँसाता गया है |
गमों को सभी से छुपाता गया है ||

हज़ारो किताबे पढ़ी थी वफा की ,
सही क्या गलत क्या बताता गया है ||

तुम्हारे सिवा भी कई और मरते ,
मुहब्बत तुम्ही से निभाता गया है ||

बहुत देर तन्हा चला था सफर में ,
कटी जो अकेले भुलाता गया है ||

सियासत बदल सी गयी आज "दानिश"
उठालो कलम अब समय आ गया है ||

Monday, 20 June 2016

ग़ज़ल


वो अपनी गुलामी को ही शान समझता है |
मांगे हुए तमगों को सम्मान समझता है ||
दौलत का नशा जिसने पाया है विरासत में |
ठोकर में वही अपनी, ईमान समझता है ||
पाने की तमन्ना में, आकाश की ऊँचाई |
इंसान जमीं को ही बेजान समझता है ||
लगता है की शायद, ये मतलब का जमाना है |
वरना तो न इंसा को भी इन्सान समझता है ||
लिपटा है गुनाहों में, हर शख्स यहाँ लेकिन |
जिससे भी मिलो वो खुदको भगवान् समझता है ||
समझा ही नहीं शायद ‘दानिश’ का कहा उसने |
जो शख्स यहाँ मुझे नादान समझता है || 

-विजय मिश्र 'दानिश'

Thursday, 16 June 2016

मुक्तक

इस बार भी मुहब्बत सौ बार में मिली थी |
वो कौन सी खता थी जो प्यार में मिली थी ||
ये ज़िन्दगी तुम्हारी ये साँस भी तुम्हारी ,
बस दर्द की सजा ही उपहार में मिली थी ||

विजय मिश्र "दानिश"
16-06-2016

मुक्तक

दिलों में आग का जलना ज़रूरी है ।
किसी की चाह में तपना ज़रूरी है ।।
तभी महकेगी अपने प्यार की दुनिया
गमों की भीड़ में हँसना ज़रूरी है ।।


विजय मिश्र "दानिश"

Monday, 13 June 2016

दानिश के दोहे

मन मन्दिर के देवता ,कह दो मन की बात |
कुछ साँसे अटकी हुई ,कब हो जाये रात ||

आँखों से करता रहा , जीवन भर बरसात |
मुझको अपना मान लो ,कह दो मन की बात ||

छुप छुप कर करता रहा ,जीवन भर आघात |
अंत समय है मीत अब ,कह दो मन की बात ||

मन में जितना ज़हर है ,सब कुछ उगलो तात |
हम पर कुछ विश्वास हो ,कह दो मन की बात ||

कह दो मन की बात को ,मत करना कुछ तोल |
मेरा तो कुछ भी नहीं , तुम तो हो अनमोल ||

अपने दिल के बोझ को ,हल्का कर लो यार |
कह दो मन की बात को तब उतरेगा भार ||

विजय मिश्र "दानिश"

दानिश के दोहे

धार दार हो लेखनी ,शब्दों में अंगार |
दुश्मन की ओकात क्या ,वो जायेगा हार ||

कागज़ कलम दवात से ,शब्दों का संसार |
माँ मुझको वरदान दे ,करूँ सृजन साकार ||

लिखने को लिखता रहा ,देश प्रेम औ प्यार |
मगर पेट की भूख ने ,कर डाला लाचार ||

कलम बेच कर देखिये ,करता है अभिमान |
शब्दों के इस मर्म को ,कौन सका है जान ||

पाठक तो मिलते नहीं ,लिखता हूँ अहसास |
मगर लेखनी कह रही ,ज़िंदा रख विश्वास ||

मुझ मूरख को शारदे ,मत देना तुम ज्ञान |
कलम सदा चलती रहे ,इतना दे वरदान ||

विजय मिश्र "दानिश"
13-06-2016