होली में गोली चली,कैसे खेलूँ रंग।
सरहद पर सैनिक खड़ा,झेल रहा है जंग।।
घोर उदासी छा गयी,कैसे खेलूँ फाग।
बिन साजन के ओ सखी,दफन सभी अनुराग।।
खूब ठहाके गूंजते,रंगते सभी गुलाल।
सौलह से अस्सी बरस,रंगे हुए थे लाल।।
लाल गुलाबी हो गए,मेरे दोनों गाल।
साजन तेरे प्यार में,भूल गयी मैं चाल।।
घर से सरहद तक मुझे ,दिखा नहीं अनुराग।
बरसो से खेला नहीं इसीलिये तो फाग।।
तुम आती तो खेलता,जी भर सखी गुलाल।
वरना तो मदिरा मुझे,करती रही हलाल।।
बरसाने की छोरियाँ, जीना करे हराम।
तिरछे नयनो से करे,बिना रंग बदनाम।।
विजय मिश्र"दानिश"
20-03-2019