धार दार हो लेखनी ,शब्दों में अंगार |
दुश्मन की ओकात क्या ,वो जायेगा हार ||
कागज़ कलम दवात से ,शब्दों का संसार |
माँ मुझको वरदान दे ,करूँ सृजन साकार ||
लिखने को लिखता रहा ,देश प्रेम औ प्यार |
मगर पेट की भूख ने ,कर डाला लाचार ||
कलम बेच कर देखिये ,करता है अभिमान |
शब्दों के इस मर्म को ,कौन सका है जान ||
पाठक तो मिलते नहीं ,लिखता हूँ अहसास |
मगर लेखनी कह रही ,ज़िंदा रख विश्वास ||
मुझ मूरख को शारदे ,मत देना तुम ज्ञान |
कलम सदा चलती रहे ,इतना दे वरदान ||
विजय मिश्र "दानिश"
13-06-2016
दुश्मन की ओकात क्या ,वो जायेगा हार ||
कागज़ कलम दवात से ,शब्दों का संसार |
माँ मुझको वरदान दे ,करूँ सृजन साकार ||
लिखने को लिखता रहा ,देश प्रेम औ प्यार |
मगर पेट की भूख ने ,कर डाला लाचार ||
कलम बेच कर देखिये ,करता है अभिमान |
शब्दों के इस मर्म को ,कौन सका है जान ||
पाठक तो मिलते नहीं ,लिखता हूँ अहसास |
मगर लेखनी कह रही ,ज़िंदा रख विश्वास ||
मुझ मूरख को शारदे ,मत देना तुम ज्ञान |
कलम सदा चलती रहे ,इतना दे वरदान ||
विजय मिश्र "दानिश"
13-06-2016
shandar dohe ,,,
ReplyDeleteलाजवाब दोहे
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