Monday, 13 June 2016

दानिश के दोहे

धार दार हो लेखनी ,शब्दों में अंगार |
दुश्मन की ओकात क्या ,वो जायेगा हार ||

कागज़ कलम दवात से ,शब्दों का संसार |
माँ मुझको वरदान दे ,करूँ सृजन साकार ||

लिखने को लिखता रहा ,देश प्रेम औ प्यार |
मगर पेट की भूख ने ,कर डाला लाचार ||

कलम बेच कर देखिये ,करता है अभिमान |
शब्दों के इस मर्म को ,कौन सका है जान ||

पाठक तो मिलते नहीं ,लिखता हूँ अहसास |
मगर लेखनी कह रही ,ज़िंदा रख विश्वास ||

मुझ मूरख को शारदे ,मत देना तुम ज्ञान |
कलम सदा चलती रहे ,इतना दे वरदान ||

विजय मिश्र "दानिश"
13-06-2016

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