Saturday, 28 July 2012

झोपडी का दिया

मेरी झोपडी मे दिया जले दिल चाहता है |
मगर झोपडी जलने का डर दिन रात सताता है ||
मेरे बच्चे स्कूल जाए ये हसरत है मेरी |
भुजा हुआ चूल्हा देख पेट भी चिल्लाता है ||
जरूरते पूरी करने मे जिंदगी गुजर गयी |
एक निवाले के लिए घर बिखर जाता है ||
चिथड़ो मे झांकता बदन बेहया लगता है |
घुटनों मे सिमट कर वो आबरू बचाता है ||
शेहरे अमीर मेरे पसीने का कर्जदार है |
फिर भी एक सिक्के को गरीब तरस जाता है ||
जिंदगी खुद ही जिंदगी पे बोझ है "दानिश" |
अजल के सफ़र मे कफ़न को तरस जाता है ||
                            - विजय मिश्र "दानिश" 

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