वो अपनी गुलामी को ही शान समझता है |
मांगे हुए तमगों को सम्मान समझता है ||
दौलत का नशा जिसने पाया है विरासत में |
ठोकर में वही अपनी, ईमान समझता है ||
पाने की तमन्ना में, आकाश की ऊँचाई |
इंसान जमीं को ही बेजान समझता है ||
लगता है की शायद, ये मतलब का जमाना है |
वरना तो न इंसा को भी इन्सान समझता है ||
लिपटा है गुनाहों में, हर शख्स यहाँ लेकिन |
जिससे भी मिलो वो खुदको भगवान् समझता है ||
समझा ही नहीं शायद ‘दानिश’ का कहा उसने |
जो शख्स यहाँ मुझे नादान समझता है ||
-विजय मिश्र 'दानिश'
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