Monday, 27 July 2020
एक विचार
*किस के पैरों में गिरकर प्रतिष्ठा पाने से अच्छा है अपने पैरों पर चल कर जो मिलें स्वीकार कर लो।हर पोस्ट पर अपनी तस्वीर लगाने से अच्छा है आपका छवि चित्र लोगो के दिलो में छपे।।*
Friday, 26 June 2020
प्रेम की व्याख्या
*अपरिपक्व प्रेम कहता है!*
*मैं तुमसे प्यार करता हूँ*
*क्यूंकि मुझे तुम्हारी जरूरत है!*
*परिपक्व*
*प्रेम कहता है!*
*मुझे तुम्हारी जरूरत है!!*
*क्यूंकि मैं तुमसे प्यार करता हूँ.*
Friday, 21 February 2020
एक विचार दानिश की कलम से
ज्ञान बोझ है यदि वह आपके भोलेपन को छीनता है .ज्ञान बोझ है यदि वह प्रसन्नता नही लाता .ज्ञान बोझ है यदि वह आपको यह विचार देता है कि आप बुद्धिमान हैं . ज्ञान बोझ है यदि वह आपको स्वतंत्र नहीं करता .ज्ञान बोझ है यदि वह आपको यह प्रतीत कराता है कि आप विशेष हैं .
Wednesday, 20 March 2019
होली के दोहे
होली में गोली चली,कैसे खेलूँ रंग।
सरहद पर सैनिक खड़ा,झेल रहा है जंग।।
घोर उदासी छा गयी,कैसे खेलूँ फाग।
बिन साजन के ओ सखी,दफन सभी अनुराग।।
खूब ठहाके गूंजते,रंगते सभी गुलाल।
सौलह से अस्सी बरस,रंगे हुए थे लाल।।
लाल गुलाबी हो गए,मेरे दोनों गाल।
साजन तेरे प्यार में,भूल गयी मैं चाल।।
घर से सरहद तक मुझे ,दिखा नहीं अनुराग।
बरसो से खेला नहीं इसीलिये तो फाग।।
तुम आती तो खेलता,जी भर सखी गुलाल।
वरना तो मदिरा मुझे,करती रही हलाल।।
बरसाने की छोरियाँ, जीना करे हराम।
तिरछे नयनो से करे,बिना रंग बदनाम।।
विजय मिश्र"दानिश"
20-03-2019
Wednesday, 29 March 2017
दोहा
उसको अपने अहम का,ऐसा चढ़ा बुखार ।
अपने मुख से कह रहा, मेरे शिष्य हज़ार ।।
विजय मिश्र"दानिश"
29-03-2017
अपने मुख से कह रहा, मेरे शिष्य हज़ार ।।
विजय मिश्र"दानिश"
29-03-2017
Saturday, 14 January 2017
मुक्तक
शुभ रात्री दोस्तों |आप सभी को चैन से सुकून की नींद आये ताकि एक नई सुबह एक खुशनुमा सुबह आप के जीवन को महका दे खुशियों से भर दे |आप सब खुश रहे ,मस्त रहे आनन्द में रहे |इस उम्मीद के साथ की हर रात की सुबह होती है और सूरज अपनी रौशनी से सब को प्रकाशमय कर देगा
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कुछ पंक्तिया आप सब की नज़र
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नज़र किसी गरीब की उठी नहीं झुकी रही ।
अमीर शेख के यहाँ गुलाम बन दुखी रही ।।
नसीब कब बदल सका हिसाब सब गलत हुआ ,
न हार का मलाल था न जीत की ख़ुशी रही ।।
विजय मिश्र दानिश
टूटा घरौंधा प्यार का ,उलझे हुए जज्बात है |
कुछ भी नहीं बदला कभी बिगड़े सदा हालात है ||
कोशिश मगर करता रहा मैं प्यार का मन्दिर बने ,
बस चार दिन की ज़िन्दगी है फिर अँधेरी रात है ||
विजय मिश्र "दानिश"
पैगाम मुहब्बत का नाकाम हुआ यारो |
जो साथ रहा बरसों ,गुमनाम हुआ यारो ||
क्या जुर्म हुआ मुझसे ,क्यों मीत खफा मुझसे ,
हर चोट लगी दिल पर ,बदनाम हुआ यारो ||
विजय मिश्र "दानिश"
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कुछ पंक्तिया आप सब की नज़र
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नज़र किसी गरीब की उठी नहीं झुकी रही ।
अमीर शेख के यहाँ गुलाम बन दुखी रही ।।
नसीब कब बदल सका हिसाब सब गलत हुआ ,
न हार का मलाल था न जीत की ख़ुशी रही ।।
विजय मिश्र दानिश
टूटा घरौंधा प्यार का ,उलझे हुए जज्बात है |
कुछ भी नहीं बदला कभी बिगड़े सदा हालात है ||
कोशिश मगर करता रहा मैं प्यार का मन्दिर बने ,
बस चार दिन की ज़िन्दगी है फिर अँधेरी रात है ||
विजय मिश्र "दानिश"
पैगाम मुहब्बत का नाकाम हुआ यारो |
जो साथ रहा बरसों ,गुमनाम हुआ यारो ||
क्या जुर्म हुआ मुझसे ,क्यों मीत खफा मुझसे ,
हर चोट लगी दिल पर ,बदनाम हुआ यारो ||
विजय मिश्र "दानिश"
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मकर संक्रांति के उपलक्ष् में कुछ दोहे
कटती रही पतंग जब ,लूटन लागे यार ।
कैसे बचती जान फिर ,लपके कई हज़ार ।।
जब तक धागे साथ थे ,चली गगन के पार ।
धागों से कट कर गिरी , अटकी है मझधार ।।
धागों का बंधन लिये ,उड़ती रही पतंग ।
रब जाने किस चोर ने ,काट दिए थे तंग ।।
कटी डोर से जिस घड़ी ,हुई बहुत लाचार ।
मैंने सोचा बाँध लूँ , दिल से दिल के तार ।।
इधर उधर उड़ती फिरूँ , रहना मुझ से दूर ।
आज़ादी मेरा चलन , करता क्यूँ मजबूर ।।
विजय मिश्र "दानिश"
14-01-2017
कैसे बचती जान फिर ,लपके कई हज़ार ।।
जब तक धागे साथ थे ,चली गगन के पार ।
धागों से कट कर गिरी , अटकी है मझधार ।।
धागों का बंधन लिये ,उड़ती रही पतंग ।
रब जाने किस चोर ने ,काट दिए थे तंग ।।
कटी डोर से जिस घड़ी ,हुई बहुत लाचार ।
मैंने सोचा बाँध लूँ , दिल से दिल के तार ।।
इधर उधर उड़ती फिरूँ , रहना मुझ से दूर ।
आज़ादी मेरा चलन , करता क्यूँ मजबूर ।।
विजय मिश्र "दानिश"
14-01-2017
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