Sunday, 27 April 2025

पहलगांव हमले पर चार पंक्तियाँ

घुस कर पाकिस्तान में,कर दो कत्लेआम।

नामर्दो की फौज को, दे दो ये पैगाम।।

अमरीका से सीख लो,वैसे करो हलाल,

बातें करना छोड़ कर,दिखला दो अन्जाम।।

Saturday, 14 January 2023

जब तक सच्चे प्यार की,उड़ती रहे पतंग।
इतना तो तय मानलो,कभी न होगी जंग।।

*विजय मिश्र दानिश*

Monday, 27 July 2020

एक विचार

*किस के पैरों में गिरकर प्रतिष्ठा पाने से अच्छा है अपने पैरों पर चल कर जो मिलें स्वीकार कर लो।हर पोस्ट पर अपनी तस्वीर लगाने से अच्छा है आपका छवि चित्र लोगो के दिलो में छपे।।*

Friday, 26 June 2020

प्रेम की व्याख्या

*अपरिपक्व प्रेम कहता है!*
*मैं तुमसे प्यार करता हूँ*
*क्यूंकि मुझे तुम्हारी जरूरत है!*
*परिपक्व*
 *प्रेम कहता है!*
 *मुझे तुम्हारी जरूरत है!!*
 *क्यूंकि मैं तुमसे प्यार करता हूँ.*

Friday, 21 February 2020

एक विचार दानिश की कलम से

ज्ञान बोझ  है  यदि  वह  आपके  भोलेपन  को  छीनता  है .ज्ञान  बोझ  है  यदि  वह  प्रसन्नता  नही  लाता .ज्ञान  बोझ  है  यदि  वह  आपको  यह  विचार  देता  है  कि  आप  बुद्धिमान  हैं . ज्ञान  बोझ  है  यदि  वह  आपको  स्वतंत्र  नहीं  करता .ज्ञान  बोझ  है  यदि  वह  आपको  यह  प्रतीत  कराता  है  कि  आप  विशेष  हैं .

Wednesday, 20 March 2019

होली के दोहे

होली में गोली चली,कैसे खेलूँ रंग।
सरहद पर सैनिक खड़ा,झेल रहा है जंग।।

घोर उदासी छा गयी,कैसे खेलूँ फाग।
बिन साजन के ओ सखी,दफन सभी अनुराग।।

खूब ठहाके गूंजते,रंगते सभी गुलाल।
सौलह से अस्सी बरस,रंगे हुए थे लाल।।

लाल गुलाबी हो गए,मेरे दोनों गाल।
साजन तेरे प्यार में,भूल गयी मैं चाल।।

घर से सरहद तक मुझे ,दिखा नहीं अनुराग।
बरसो से खेला नहीं इसीलिये तो फाग।।

तुम आती तो खेलता,जी भर सखी गुलाल।
वरना तो मदिरा मुझे,करती रही हलाल।।

बरसाने की छोरियाँ, जीना करे हराम।
तिरछे नयनो से करे,बिना रंग बदनाम।।

विजय मिश्र"दानिश"
20-03-2019

Wednesday, 29 March 2017

दोहा

उसको अपने अहम का,ऐसा चढ़ा बुखार ।
अपने मुख से कह रहा, मेरे शिष्य हज़ार ।।

विजय मिश्र"दानिश"
29-03-2017

Saturday, 14 January 2017

मुक्तक

शुभ रात्री दोस्तों |आप सभी को चैन से सुकून की नींद आये ताकि एक नई सुबह एक खुशनुमा सुबह आप के जीवन को महका दे खुशियों से भर दे |आप सब खुश रहे ,मस्त रहे आनन्द में रहे |इस उम्मीद के साथ की हर रात की सुबह होती है और सूरज अपनी रौशनी से सब को प्रकाशमय कर देगा
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कुछ पंक्तिया आप सब की नज़र
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नज़र किसी गरीब की उठी नहीं झुकी रही ।
अमीर शेख के यहाँ गुलाम बन दुखी रही ।।
नसीब कब बदल सका हिसाब सब गलत हुआ ,
न हार का मलाल था न जीत की ख़ुशी रही ।।

विजय मिश्र दानिश

टूटा  घरौंधा  प्यार  का ,उलझे  हुए  जज्बात है |
कुछ भी नहीं बदला कभी बिगड़े सदा हालात है ||
कोशिश मगर करता रहा मैं प्यार का मन्दिर बने ,
बस चार दिन की ज़िन्दगी है फिर अँधेरी रात है ||

विजय मिश्र "दानिश"

पैगाम मुहब्बत का नाकाम हुआ यारो |
जो साथ रहा बरसों ,गुमनाम हुआ यारो ||
क्या जुर्म हुआ मुझसे ,क्यों मीत खफा मुझसे ,
हर चोट लगी दिल पर ,बदनाम हुआ यारो ||

विजय मिश्र "दानिश"


,

मकर संक्रांति के उपलक्ष् में कुछ दोहे

कटती रही पतंग जब ,लूटन लागे यार ।
कैसे बचती जान फिर ,लपके कई हज़ार ।।

जब तक धागे साथ थे ,चली गगन के पार ।
धागों से कट कर गिरी , अटकी है मझधार ।।

धागों का बंधन लिये ,उड़ती रही पतंग ।
रब जाने किस चोर ने ,काट दिए थे तंग ।।

कटी डोर से जिस घड़ी ,हुई बहुत लाचार ।
मैंने सोचा बाँध लूँ  , दिल से दिल के तार ।।

इधर उधर उड़ती फिरूँ , रहना मुझ से दूर ।
आज़ादी मेरा चलन , करता क्यूँ मजबूर ।।

विजय मिश्र "दानिश"
14-01-2017

Thursday, 30 June 2016

ग़ज़ल

बिना कुछ कहे भी हँसाता गया है |
गमों को सभी से छुपाता गया है ||

हज़ारो किताबे पढ़ी थी वफा की ,
सही क्या गलत क्या बताता गया है ||

तुम्हारे सिवा भी कई और मरते ,
मुहब्बत तुम्ही से निभाता गया है ||

बहुत देर तन्हा चला था सफर में ,
कटी जो अकेले भुलाता गया है ||

सियासत बदल सी गयी आज "दानिश"
उठालो कलम अब समय आ गया है ||

Monday, 20 June 2016

ग़ज़ल


वो अपनी गुलामी को ही शान समझता है |
मांगे हुए तमगों को सम्मान समझता है ||
दौलत का नशा जिसने पाया है विरासत में |
ठोकर में वही अपनी, ईमान समझता है ||
पाने की तमन्ना में, आकाश की ऊँचाई |
इंसान जमीं को ही बेजान समझता है ||
लगता है की शायद, ये मतलब का जमाना है |
वरना तो न इंसा को भी इन्सान समझता है ||
लिपटा है गुनाहों में, हर शख्स यहाँ लेकिन |
जिससे भी मिलो वो खुदको भगवान् समझता है ||
समझा ही नहीं शायद ‘दानिश’ का कहा उसने |
जो शख्स यहाँ मुझे नादान समझता है || 

-विजय मिश्र 'दानिश'

Thursday, 16 June 2016

मुक्तक

इस बार भी मुहब्बत सौ बार में मिली थी |
वो कौन सी खता थी जो प्यार में मिली थी ||
ये ज़िन्दगी तुम्हारी ये साँस भी तुम्हारी ,
बस दर्द की सजा ही उपहार में मिली थी ||

विजय मिश्र "दानिश"
16-06-2016

मुक्तक

दिलों में आग का जलना ज़रूरी है ।
किसी की चाह में तपना ज़रूरी है ।।
तभी महकेगी अपने प्यार की दुनिया
गमों की भीड़ में हँसना ज़रूरी है ।।


विजय मिश्र "दानिश"

Monday, 13 June 2016

दानिश के दोहे

मन मन्दिर के देवता ,कह दो मन की बात |
कुछ साँसे अटकी हुई ,कब हो जाये रात ||

आँखों से करता रहा , जीवन भर बरसात |
मुझको अपना मान लो ,कह दो मन की बात ||

छुप छुप कर करता रहा ,जीवन भर आघात |
अंत समय है मीत अब ,कह दो मन की बात ||

मन में जितना ज़हर है ,सब कुछ उगलो तात |
हम पर कुछ विश्वास हो ,कह दो मन की बात ||

कह दो मन की बात को ,मत करना कुछ तोल |
मेरा तो कुछ भी नहीं , तुम तो हो अनमोल ||

अपने दिल के बोझ को ,हल्का कर लो यार |
कह दो मन की बात को तब उतरेगा भार ||

विजय मिश्र "दानिश"

दानिश के दोहे

धार दार हो लेखनी ,शब्दों में अंगार |
दुश्मन की ओकात क्या ,वो जायेगा हार ||

कागज़ कलम दवात से ,शब्दों का संसार |
माँ मुझको वरदान दे ,करूँ सृजन साकार ||

लिखने को लिखता रहा ,देश प्रेम औ प्यार |
मगर पेट की भूख ने ,कर डाला लाचार ||

कलम बेच कर देखिये ,करता है अभिमान |
शब्दों के इस मर्म को ,कौन सका है जान ||

पाठक तो मिलते नहीं ,लिखता हूँ अहसास |
मगर लेखनी कह रही ,ज़िंदा रख विश्वास ||

मुझ मूरख को शारदे ,मत देना तुम ज्ञान |
कलम सदा चलती रहे ,इतना दे वरदान ||

विजय मिश्र "दानिश"
13-06-2016

Saturday, 28 July 2012

झोपडी का दिया

मेरी झोपडी मे दिया जले दिल चाहता है |
मगर झोपडी जलने का डर दिन रात सताता है ||
मेरे बच्चे स्कूल जाए ये हसरत है मेरी |
भुजा हुआ चूल्हा देख पेट भी चिल्लाता है ||
जरूरते पूरी करने मे जिंदगी गुजर गयी |
एक निवाले के लिए घर बिखर जाता है ||
चिथड़ो मे झांकता बदन बेहया लगता है |
घुटनों मे सिमट कर वो आबरू बचाता है ||
शेहरे अमीर मेरे पसीने का कर्जदार है |
फिर भी एक सिक्के को गरीब तरस जाता है ||
जिंदगी खुद ही जिंदगी पे बोझ है "दानिश" |
अजल के सफ़र मे कफ़न को तरस जाता है ||
                            - विजय मिश्र "दानिश"